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 #दादा_की_आफ्टर_मैरिज_गर्लफ्रेंड      हास्य-व्यंग्य कहानी       ✍️ मोहन   '' दादा कुछ अजीब नहीं हो.. इक्कीसवीं सदी में काॅलेज तक की पढ़ाई कर ली, लाॅ की डिग्री ले ली और एक भी गर्लफ्रेंड न बनाई।''  दादा को लड़कों ने चिढ़ा दिया और चढ़ा भी दिया।  बात लड़के सही कह रहे थे, दादा शादीशुदा हो गए थे बीबी भी खूबसूरत पायी पर गर्लफ्रेंड का मजा न पाए।  फलाने दादा अभी तक लड़कों को नककटा समझते थे लेकिन लड़के चूंकि अपने को नककटा नहीं समझते थे और अपने ग्रुप में दादा को शामिल करना चाहते थे। सो लड़के हमेशा दादा के सामने गर्लफ्रेंड की अच्छाई के कसीदे पढ़ते।    दादा भी ठहरे इंसान... एक दिन मन बदल ही गया। सोंचा बीबी घर पर ही तो रहती है वैसे भी कोर्ट में मुवक्किल न आए तो सिंगलैती रहती है लाओ गर्लफ्रेंड बना ही लेते हैं।    साथी बनाने के लिए व्यक्ति अपना कार्यक्षेत्र चुनता है... क्योंकि बहुत सारी सहूलियतें रहती हैं।  दादा ने भी यही किया था...   दैवयोग से चैम्बर में चार चौकी छोड़कर पांचवी चौकी की एडवोकेट दादा को देखने म...

कहानी : आक्षेप

 #कहानी : आक्षेप ---------------- प्रियंवदा रामकली की बहुत दुलारी है। वह जब भी शहर से आती है, रामकली के पास जरूर जाती है। रामकली एक शुद्ध गाँव की कन्या है, जिस गाँव को न तो शहर की चमक-दमक से कुछ लेना है और न कानूनी नियम-कायदों से। गाँधी जी का ग्राम स्वराज का सपना इधर ही साकार है जहां गांव के अपने नियम हैं एकदम खाप पंचायत की तरह। पुरुष प्रधान समाज भी है.... ये भी गांधी जी का ही सपना था। गांधी जी महिलाओं को कुशल गृहिणी ही देखना चाहते थे।  शहर हो या गांव दो पक्षों के बीच लड़ाई-झगड़े हुए नहीं कि महिलाओं की अस्मिता को लक्ष्य करना प्रारंभ। शहर इस समस्या से निपटने में थोड़ा बीस इसलिए हैं कि कमोबेश वहां अब ये केवल कानूनी लड़ाई होती है लेकिन गांवों में कानूनी लड़ाई से ज्यादा सामाजिक लड़ाई होती है। शहर थोड़ा-बहुत आदर्शवादी हैं परंतु गाँवों में कटु यथार्थवाद ही है।  प्रियंवदा इस बार काफी समय बाद गाँव घूमने आई है। उसने उच्च शिक्षा प्राप्त कर ली है और महिला आयोग में एक कार्यकर्ता भी है। गांव आने के दूसरे दिन बाद ही अपनी सखी रामकली से मिलने  पहुंच जाती है। पर यह क्या रामकली तो बैठ...

ट्यूशन

--------------------------------- बस छोटी सी बात कहनी है, कोई लंबा लेख नहीं है।लेख गार्जियन्स के लिए है जो अपने बच्चों को ट्यूशन पढ़वाते हैं। मेरा ट्यूशन पढ़ाने का लंबा अनुभव रहा है। कल एक ट्यूशन पढ़ाने वाले मित्र की मनःस्थिति और कुछ उलझनों को देखकर  लगा कि मुझे गार्जियन्स से उन अनुभवों को शेयर करना चाहिए। यह कुछ हद तक स्कूल और कोचिंग के परिप्रेक्ष्य में भी उपयोगी हो सकता है तथापि ट्यूशन के लिए अधिक उपयोगी है। बहुधा गार्जियन्स को देखा जाता है कि जब वे टीचर से पढ़ाए जाने वाले समय, फीस, 'क्या पढ़ाया' आदि पर बात कर रहे होते हैं तो उनका बच्चा वहीं होता है। जब वे ट्यूशन टीचर को फीस दे रहे होते हैं तो बच्चा वहीं होता है। जब वे टीचर से गैरहाजिरी के दिनों पर बात कर रहे होते हैं तो बच्चा वहीं होता है। 'टीचर ने क्या पढ़ाया/कितना पढ़ाया/ कैसे पढ़ाया?' ये प्रश्न 'डायरेक्ट' बच्चे से पूछते हैं। क्या आपको नहीं लगता कि जो व्यवसाय का रिश्ता केवल आपमें और टीचर में होना चाहिए उसमें नाहक बच्चे को घसीट रहे हैं! क्या बच्चा टीचर के प्रति श्रद्धालु रह पाएगा इसके बाद? 'श्रद्...

विभीषण

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निःसंदेह रामायण में सबसे ज्यादा वाद-विवाद का विषय विभीषण है। इस वाद-विवाद में अगर कोई निर्णायक स्थिति में आ जाए तो मैं तो उससे सहमत ही नहीं होउंगा क्योंकि विभीषण का चरित्र ही है द्वंद्व.... मानसिक द्वंद्व..... द्वंद्व भौतिक जगत में आध्यात्मिकता का। भौतिक जगत में  विभीषण को हम शायद ही सही ठहरा पाएं; विभीषण को निरुत्तर कर देने वाले रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण के तर्क निःसंदेह अकाट्य थे। ये सही है कि स्त्री चोरी के आरोपी कारण साथ नहीं दिया जाना चाहिए लेकिन मेरे हिसाब से उसे राम का साथ भी नहीं देना था। तटस्थ हो जाता... तपस्या करने चला जाता। विभीषण को उसका ज्यादा ज्ञान और उसे पचा न पाना भारी पड़ा। उसे जैसे पता चला कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो गया। ऐसा नहीं है कि रावण ने इसके पहले देवांगनाओं से जबरदस्ती नहीं की थी या अत्याचार नहीं किये थे, विभीषण तब भी था। 'तू त्रिभुवन स्वामिनी को उठा लाया?' ये कथन ही दर्शाता है कि विभीषण की समस्या क्या थी। विभीषण सभी ज्ञान और शक्तियां होते हुए सही देश-काल-वातावरण में उनका प्रयोग न करने वाला माना जा सकता है। ये...

कहना

कुछ लोग कहते हैं 'लोग क्या कहेंगे!' और कुछ लोग कहते हैं 'लोगों का काम है कहना'। अगर यहां देखा जाए तो पहले वाले में भौतिकता के रास्ते और दूसरे में आध्यात्मिकता के रास्ते पाए जा सकते हैं। जब हम कहते हैं 'लोग क्या कहेंगे!'  तब हम अपने को समाज की एक कड़ी के रूप देख रहे होते हैं। समाज से जुड़े रहकर उसको अपनी क्षमतानुसार अपने अनुकूल बनाकर और उसकी क्षमतानुसार उसके अनुकूल बनकर भौतिक उन्नति करते हैं। सांसारिक लाभ-हानियों को देखते हैं। ए ग्रेड की जॉब ही अंतिम लक्ष्य होती है... आईएएस ही बनना होता है। फिर ये 'कुछ लोगों का कहना' हमको उसी दिशा में धकेलता भी रहता है.... मोटिवेशन देता है। अगर दूसरे वाले को देखें तो शिक्षा के पांच चरण में जो एक चरण अन्नमय कोष का है उसके लिए पेट भरने के लिए कोई भी एक छोटी सी नौकरी लेकर फिर अपनी शक्तियों को आध्यात्म की जानकारी में लगा देते हैं। हमें पता होता है कि सांसारिक उन्नति का कोई अंत नहीं है, और न ही कोई ऐसा स्टेज है जहां आलोचना न हो। हम सोचते हैं आईएएस बनकर ये करेंगे वो करेंगे, जबकि यहां प्रधानमंत्री तक पर मेम्स बनते हैं। इसलिए ...

विधान को मानना ही देवत्व है।

जब लोग 'मर्यादा पुरुषोत्तम राम' कहते हैं तो बहुत लोग ये समझते हैं कि भगवान् विष्णु ने केवल अवतारी के रूप में ही सांसारिक मर्यादा (कर्मफल) का पालन किया;वो भी राम के रूप में। श्रीकृष्ण के प्रति ये धारणा है कि वे कर्मबंधन से नहीं बंधे थे, या वे श्रीराम की तरह मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं थे।   परंतु अगर ध्यान से देखा जाए तो कार्य-कारण से परम ब्रह्म के तीनों शक्तिपुंज ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी अपने वास्तविक स्वरूप में बंधे हुए हैं, वे अपनी मर्यादा नहीं लांघते।  'इंद्र' एक सिंहासन का नाम रहा है। उसपर बैठने वाले देवराज बदलते रहे हैं। अर्जित सुकर्मों के अनुसार कोई भी आत्मन् देवता, मनुष्य या अन्य योनि में होता है। भगवान शिव और माता सती ने कभी कर्मबंधन को मानने से इंकार नहीं किया। श्रीकृष्ण ने महाभारत में अर्जुन को अपने विराट स्वरूप का दर्शन तो कराया परंतु कौरवों की हत्या के निमित्त बनने की वजह से गांधारी के श्राप को उन्होंने कभी नहीं काटा, पूरा यदुवंश उनकी आंखों के आगे लड़कर मर गया, स्वयं भी एक बहेलिए की तीर से मरे। रामायण की कथा का आदि भगवान विष्णु के कर्मफल को भोगना ही ह...

लाॅक डाउन के मायने 👉 जरूर पढ़िए और शेयर करिए

पहली बात सोशल मीडिया पर कृपया अफवाह न फैलाएं। खतरा बताकर सावधानी बरतने की अपील करें न कि लोगों को पैनिक करें। (जैसा कि अभी मैंने कई जगह पढ़ा कि ये लाकडाउन तो बस शुरुआत है...... ।) देखिए 1 महीने के लगभग खुद को इतनी प्रीकाशनरी मीजर्स के साथ घर में नियोजित तरीके से कैद रखना आसान नहीं होता, उसके लिए सबसे बड़ा सम्बल व्यक्ति की मानसिक शक्ति और जल्द ही इस संकट से निजात पाने की आशा है। अब अगर आप बेवजह पैनिक खबरें फैलाएंगे तो व्यक्ति  मरने से पहले 20 बार मरेगा। बात करते हैं लाकडाउन पर। लाकडाउन का मतलब स्थिति और खराब नहीं हुई है बल्कि हम उसपर एक बेहतरीन रणनीति बना रहे। जैसा कि सबको पता है कि वायरस संक्रमित व्यक्ति के लक्षण दिखने में 8-8 दिन लग जाते हैं, परंतु इतने समय में एक ही व्यक्ति इसको हजारों में और वे हजार आगे फैला सकते हैं। लाकडाउन से ये होगा कि अगर कोई व्यक्ति इन्फेक्टेड है तो वो अधिकतम अपने परिवार तक रहेगा, लक्षण दिखते ही तुरंत उसका उपचार कर लिया जाएगा और फिर यह महामारी की तरह नहीं फैलेगा। अब लाकडाउन में मेन रोड तो पुलिस देख लेगी लेकिन गांव-मुहल्ले में ये काम हमीं आपको करना...