विभीषण
निःसंदेह रामायण में सबसे ज्यादा वाद-विवाद का विषय विभीषण है। इस वाद-विवाद में अगर कोई निर्णायक स्थिति में आ जाए तो मैं तो उससे सहमत ही नहीं होउंगा क्योंकि विभीषण का चरित्र ही है द्वंद्व.... मानसिक द्वंद्व..... द्वंद्व भौतिक जगत में आध्यात्मिकता का।
भौतिक जगत में विभीषण को हम शायद ही सही ठहरा पाएं; विभीषण को निरुत्तर कर देने वाले रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण के तर्क निःसंदेह अकाट्य थे।
ये सही है कि स्त्री चोरी के आरोपी कारण साथ नहीं दिया जाना चाहिए लेकिन मेरे हिसाब से उसे राम का साथ भी नहीं देना था। तटस्थ हो जाता... तपस्या करने चला जाता।
विभीषण को उसका ज्यादा ज्ञान और उसे पचा न पाना भारी पड़ा। उसे जैसे पता चला कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो गया। ऐसा नहीं है कि रावण ने इसके पहले देवांगनाओं से जबरदस्ती नहीं की थी या अत्याचार नहीं किये थे, विभीषण तब भी था। 'तू त्रिभुवन स्वामिनी को उठा लाया?' ये कथन ही दर्शाता है कि विभीषण की समस्या क्या थी।
विभीषण सभी ज्ञान और शक्तियां होते हुए सही देश-काल-वातावरण में उनका प्रयोग न करने वाला माना जा सकता है।
ये सब मेरे विचार हैं, लोगों के विचार पृथक हो सकते हैं... होने भी चाहिए। रामायण बिना किसी पूर्वाग्रह के देखनी चाहिए, ये भूलकर कि कौन भगवान है और कौन राक्षस। फिर सही गलत का निर्णय खुद लेना चाहिए।
✍️ मोहन

Comments
Post a Comment