कहानी : हमसफर कैसे कैसे भाग 6
कहानी :हमसफर कैसे कैसे भाग 6
स्कूल गेट से आगे आकर स्नेहा गली में खड़ी थी। अमिताभ भी आफिस से हाफ डे लेकर आ गया। दोनों टहलते हुए मेन रोड की तरफ चलने लगे। हाय-हैल्लो की औपचारिकता के बाद अमिताभ ने जिसने कि सुन रखा था कि लड़कियों से मिलने जाओ तो कुछ तो लेते ही जाना चाहिए। अपनी लाई हुई तीनों चाकलेट एक-एक करके स्नेहा को पकड़ा दीं।
'' एक आपके लिए, एक चंकू के लिए और एक उस टेडी के लिए जिसे तुम मेरा नाम देकर वीडियो काॅलिंग पर चूमती हो। ''
'अरे इतनी सारी चाॅकलेट्स!...... ओह! किटकैट, माय फेवरिट वन्। आपको कैसे पता मुझे किटकैट की चाॅकलेट्स पसंद हैं?' स्नेहा की आवाज में ऐसा लगर रहा था जैसे वह आवाज उखड़ रही हो अर्थात् आवाज अंदर से न आ रही हो।
'वो मैंने वीडियो काॅलिंग पर आपके बेडरूम में इसी के रैपर्स देखे थे तो मैंने सोचा..... ।' आवाज अमिताभ की भी उखड़ ही रही थी लेकिन स्नेहा से कुछ और ही ज्यादा।
आवाज का यह हाल उनका नर्वस होना था, वीडियो काॅल पर तो पिछले 1 महीने से रात-रातभर बात होती थी परंतु दोनों की फेस-टु-फेस मुलाकात पहली थी। उनका प्रेम भी पहला था। मिल तो नियोजित स्थान पर ही रहे थे परंतु पहली मुलाकात के स्थान का निर्धारण ये गली ही होगी ऐसा उन्होंने कभी भी प्यार के हसीन ख्वाबों में सोंचा न था।
अमिताभ के चाकलेट के चयन पर इस तरह सीधा-सा जवाब सुनकर स्नेहा खिलखिलाकर हँस पड़ी. और इस बार फिर से 'बुद्धू' बोल दी।
अमिताभ का यही बुद्धूपना जो उसका भोलापन था... उसकी इनोसेंसी थी, स्नेहा को उसकी दीवानी बनाती थी।
'अब तक जितनी लड़कियों की आवाज सुनी है उनमें आपकी आवाज सबसे प्यारी है।'
-'अच्छा जी! कितनी लड़कियों की आवाजें सुन चुके हो अबतक?'
-'नहीं मेरा मतलब वो नहीं था।'
स्नेहा समझती सब थी, बस उसको इस तरह अमिताभ की खिंचाई करने में बड़ा मजा आया और वह खिलखिलाकर हँस पड़ी।
आगे बढ़ते हुए दोनों मेन रोड तक पहुंच गये, स्नेहा ने मुख्य रास्ता न पकड़कर सड़क को क्रास किया और मंदिर के बगल से एक गली के रास्ते पर आ गई।
'अब क्या घर तक छोड़ने जाएंगे?'
-'क्यों नहीं? कहिए तो छोड़ आते हैं, कंधे पर बिठाकर। पैदल ही हैं हम, बाइक तो लाए नहीं... है भी नहीं '
-'ठीक ही है... पर हम कंधे पर नहीं, सर पर बैठेंगे... बैठाइएगा?'
दोनों हँस पड़े।
'अच्छा अमिताभ! अब यहां से आप वापस हो जाओ, यह मेरे घर का शार्टकट है, यहां से घर काफी करीब है मैं चल जाउंगी। कोई साथ में देख लिया तो दिक्कत हो जाएगी।'
दोंनों एक दूसरे के विपरीत दिशा में घूम कर चल देते हैं, परंतु मुड़-मुड़कर देखते रहते हैं। शायद उस पहली मुलाकात को हमेशा की बना लेने की लालसा हो।
अमिताभ ने जेब से फोन निकाला और घर की तरफ जाती स्नेहा के चैट बाक्स में लिखा-'कोई तो रोक लो!' स्नेहा मुड़कर मुस्कराई और फिर गली के मोड़ ने अगली मुलाकात के लिए दोनों को आंख ओट कर दिया।
शाम को स्नेहा का मैसेज आता है - 'मैं आप से बहुत ज्यादा इम्प्रेस हूँ। मुझे नहीं पता कि मैं क्या कह रही हूं, बट आई रियली इन लव विद यू।'
अमिताभ को शायद ही शब्दों में सुनने की प्रतीक्षा रही हो। वह तो हृदयगत तरंगों को महसूस कर चुका था। उस दिन स्नेहा के इंस्टाग्राम स्टेटस पर तीनों चाॅकलेट्स के साथ 'थैंक्यू भूतू और आइ लव यू भूतू'
का स्टेटस लगा था।
'अच्छा सुनो! अपने कमरे पर नहीं बुलाओगे?'
'क्यों नहीं.. आपका कमरा है, आ जाइए।'
-'चलो फिर आती हूँ कल, सेफ तो है न!'
-'हाँ-हाँ यहाँ कोई दिक्कत नहीं है। '
आज अमिताभ सुबह से कमरे की सफाई में लगा है, पूरा एक बोरा कूड़ा निकला है उसके कमरे से। निकलना भी चाहिए... किराए पर रहने वाला पढ़ाकू लड़का जो है।
दिन ने दोपहर से शाम की तरफ रुख किया और इधर अमिताभ की बेचैनी का अंत हुआ, स्नेहा की स्कूटी उसके कमरे के बाहर थी। अमिताभ बाहर से उसके हाथों को पकड़े हुए अंदर लाया।
-''अच्छा सजाया है कमरा! मेरे लिए? ''
-'ह्म्म.. आपके लिए ही।'
स्नेहा हाथ में कुछ लिए थी, अमिताभ ने पूछा -
'यह क्या है? '
-'आइस्क्रीम है..अपने लिए लाई हूं, यहीं बैठकर खाऊंगी।'
-'अरे! अपने लिए..!'
- 'हाँ! वैसे खाना हो तो इसी में खा सकते हो!'
रैपर खुलने लगा, आइस्क्रीम खाई गई, आइस्क्रीम खाते-खाते कब दोनों के होंठ लड़ गए पता ही नहीं चला।
मिलने - मिलाने का क्रम यह चलता रहा। एक दिन जब स्नेहा अमिताभ के कमरे में थी। पढ़ाई-लिखाई और कैरियर को लेकर बातें हो रही थीं। अमिताभ मेन्स की तैयारी कर रहा था। उसकी परीक्षा जुलाई-अगस्त में थी और स्नेहा के ग्रेजुएशन की परीक्षा आने वाले कुछ महीनों में। इसके बाद स्नेहा को आगे की तैयारी के लिए घरवाले लखनऊ भेज रहे थे।
-'अच्छा शादी कब कर रहे हो अमिताभ?'
-'मेंस देने ही जा रहा हूं... इसके बाद इंटरव्यू.... रिजल्ट और फिर तुम्हारा इंतजार।'
-'अच्छा! मुझसे शादी करोगे? '
-'हाँ बिलकुल। ऐसे क्यों पूछ रही हो?'
-'बस यूं ही, तुम मेरा पूरा नाम जानते हो?'
-'हाँ क्यों!'
-'स्नेहा चक्रवर्ती हूँ, मि. अमिताभ त्रिपाठी!'
-'' जानता हूँ! पहले से भी जानता हूं।''
-'बाकि बातें भी जानते होगे फिर... क्या दिक्कतें आएंगी।न आप इतने आधुनिक समाज में रह रहे हो और न मैं!'
-'देखो स्नेहा... अभी ये बातें करना व्यर्थ हैं, अभी परीक्षा पर फोकस करो। आखिर अब इस रास्ते पर निकल पड़े हैं तो समाधान तो होगा ही।'
जुलाई महीने की शुरुआत और स्नेहा के लखनऊ जाने की तैयारियां हो रही हैं। इधर अमिताभ भी अपनी परीक्षा को लेकर गंभीर है।
#क्रमशः
✍️ मोहन
स्कूल गेट से आगे आकर स्नेहा गली में खड़ी थी। अमिताभ भी आफिस से हाफ डे लेकर आ गया। दोनों टहलते हुए मेन रोड की तरफ चलने लगे। हाय-हैल्लो की औपचारिकता के बाद अमिताभ ने जिसने कि सुन रखा था कि लड़कियों से मिलने जाओ तो कुछ तो लेते ही जाना चाहिए। अपनी लाई हुई तीनों चाकलेट एक-एक करके स्नेहा को पकड़ा दीं।
'' एक आपके लिए, एक चंकू के लिए और एक उस टेडी के लिए जिसे तुम मेरा नाम देकर वीडियो काॅलिंग पर चूमती हो। ''
'अरे इतनी सारी चाॅकलेट्स!...... ओह! किटकैट, माय फेवरिट वन्। आपको कैसे पता मुझे किटकैट की चाॅकलेट्स पसंद हैं?' स्नेहा की आवाज में ऐसा लगर रहा था जैसे वह आवाज उखड़ रही हो अर्थात् आवाज अंदर से न आ रही हो।
'वो मैंने वीडियो काॅलिंग पर आपके बेडरूम में इसी के रैपर्स देखे थे तो मैंने सोचा..... ।' आवाज अमिताभ की भी उखड़ ही रही थी लेकिन स्नेहा से कुछ और ही ज्यादा।
आवाज का यह हाल उनका नर्वस होना था, वीडियो काॅल पर तो पिछले 1 महीने से रात-रातभर बात होती थी परंतु दोनों की फेस-टु-फेस मुलाकात पहली थी। उनका प्रेम भी पहला था। मिल तो नियोजित स्थान पर ही रहे थे परंतु पहली मुलाकात के स्थान का निर्धारण ये गली ही होगी ऐसा उन्होंने कभी भी प्यार के हसीन ख्वाबों में सोंचा न था।
अमिताभ के चाकलेट के चयन पर इस तरह सीधा-सा जवाब सुनकर स्नेहा खिलखिलाकर हँस पड़ी. और इस बार फिर से 'बुद्धू' बोल दी।
अमिताभ का यही बुद्धूपना जो उसका भोलापन था... उसकी इनोसेंसी थी, स्नेहा को उसकी दीवानी बनाती थी।
'अब तक जितनी लड़कियों की आवाज सुनी है उनमें आपकी आवाज सबसे प्यारी है।'
-'अच्छा जी! कितनी लड़कियों की आवाजें सुन चुके हो अबतक?'
-'नहीं मेरा मतलब वो नहीं था।'
स्नेहा समझती सब थी, बस उसको इस तरह अमिताभ की खिंचाई करने में बड़ा मजा आया और वह खिलखिलाकर हँस पड़ी।
आगे बढ़ते हुए दोनों मेन रोड तक पहुंच गये, स्नेहा ने मुख्य रास्ता न पकड़कर सड़क को क्रास किया और मंदिर के बगल से एक गली के रास्ते पर आ गई।
'अब क्या घर तक छोड़ने जाएंगे?'
-'क्यों नहीं? कहिए तो छोड़ आते हैं, कंधे पर बिठाकर। पैदल ही हैं हम, बाइक तो लाए नहीं... है भी नहीं '
-'ठीक ही है... पर हम कंधे पर नहीं, सर पर बैठेंगे... बैठाइएगा?'
दोनों हँस पड़े।
'अच्छा अमिताभ! अब यहां से आप वापस हो जाओ, यह मेरे घर का शार्टकट है, यहां से घर काफी करीब है मैं चल जाउंगी। कोई साथ में देख लिया तो दिक्कत हो जाएगी।'
दोंनों एक दूसरे के विपरीत दिशा में घूम कर चल देते हैं, परंतु मुड़-मुड़कर देखते रहते हैं। शायद उस पहली मुलाकात को हमेशा की बना लेने की लालसा हो।
अमिताभ ने जेब से फोन निकाला और घर की तरफ जाती स्नेहा के चैट बाक्स में लिखा-'कोई तो रोक लो!' स्नेहा मुड़कर मुस्कराई और फिर गली के मोड़ ने अगली मुलाकात के लिए दोनों को आंख ओट कर दिया।
शाम को स्नेहा का मैसेज आता है - 'मैं आप से बहुत ज्यादा इम्प्रेस हूँ। मुझे नहीं पता कि मैं क्या कह रही हूं, बट आई रियली इन लव विद यू।'
अमिताभ को शायद ही शब्दों में सुनने की प्रतीक्षा रही हो। वह तो हृदयगत तरंगों को महसूस कर चुका था। उस दिन स्नेहा के इंस्टाग्राम स्टेटस पर तीनों चाॅकलेट्स के साथ 'थैंक्यू भूतू और आइ लव यू भूतू'
का स्टेटस लगा था।
'अच्छा सुनो! अपने कमरे पर नहीं बुलाओगे?'
'क्यों नहीं.. आपका कमरा है, आ जाइए।'
-'चलो फिर आती हूँ कल, सेफ तो है न!'
-'हाँ-हाँ यहाँ कोई दिक्कत नहीं है। '
आज अमिताभ सुबह से कमरे की सफाई में लगा है, पूरा एक बोरा कूड़ा निकला है उसके कमरे से। निकलना भी चाहिए... किराए पर रहने वाला पढ़ाकू लड़का जो है।
दिन ने दोपहर से शाम की तरफ रुख किया और इधर अमिताभ की बेचैनी का अंत हुआ, स्नेहा की स्कूटी उसके कमरे के बाहर थी। अमिताभ बाहर से उसके हाथों को पकड़े हुए अंदर लाया।
-''अच्छा सजाया है कमरा! मेरे लिए? ''
-'ह्म्म.. आपके लिए ही।'
स्नेहा हाथ में कुछ लिए थी, अमिताभ ने पूछा -
'यह क्या है? '
-'आइस्क्रीम है..अपने लिए लाई हूं, यहीं बैठकर खाऊंगी।'
-'अरे! अपने लिए..!'
- 'हाँ! वैसे खाना हो तो इसी में खा सकते हो!'
रैपर खुलने लगा, आइस्क्रीम खाई गई, आइस्क्रीम खाते-खाते कब दोनों के होंठ लड़ गए पता ही नहीं चला।
मिलने - मिलाने का क्रम यह चलता रहा। एक दिन जब स्नेहा अमिताभ के कमरे में थी। पढ़ाई-लिखाई और कैरियर को लेकर बातें हो रही थीं। अमिताभ मेन्स की तैयारी कर रहा था। उसकी परीक्षा जुलाई-अगस्त में थी और स्नेहा के ग्रेजुएशन की परीक्षा आने वाले कुछ महीनों में। इसके बाद स्नेहा को आगे की तैयारी के लिए घरवाले लखनऊ भेज रहे थे।
-'अच्छा शादी कब कर रहे हो अमिताभ?'
-'मेंस देने ही जा रहा हूं... इसके बाद इंटरव्यू.... रिजल्ट और फिर तुम्हारा इंतजार।'
-'अच्छा! मुझसे शादी करोगे? '
-'हाँ बिलकुल। ऐसे क्यों पूछ रही हो?'
-'बस यूं ही, तुम मेरा पूरा नाम जानते हो?'
-'हाँ क्यों!'
-'स्नेहा चक्रवर्ती हूँ, मि. अमिताभ त्रिपाठी!'
-'' जानता हूँ! पहले से भी जानता हूं।''
-'बाकि बातें भी जानते होगे फिर... क्या दिक्कतें आएंगी।न आप इतने आधुनिक समाज में रह रहे हो और न मैं!'
-'देखो स्नेहा... अभी ये बातें करना व्यर्थ हैं, अभी परीक्षा पर फोकस करो। आखिर अब इस रास्ते पर निकल पड़े हैं तो समाधान तो होगा ही।'
जुलाई महीने की शुरुआत और स्नेहा के लखनऊ जाने की तैयारियां हो रही हैं। इधर अमिताभ भी अपनी परीक्षा को लेकर गंभीर है।
#क्रमशः
✍️ मोहन
बहुत बढ़िया.... बधाई 💐💐
ReplyDeleteशानदार।👌👌
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