कहानी : आक्षेप

 #कहानी : आक्षेप

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प्रियंवदा रामकली की बहुत दुलारी है। वह जब भी शहर से आती है, रामकली के पास जरूर जाती है। रामकली एक शुद्ध गाँव की कन्या है, जिस गाँव को न तो शहर की चमक-दमक से कुछ लेना है और न कानूनी नियम-कायदों से। गाँधी जी का ग्राम स्वराज का सपना इधर ही साकार है जहां गांव के अपने नियम हैं एकदम खाप पंचायत की तरह। पुरुष प्रधान समाज भी है.... ये भी गांधी जी का ही सपना था। गांधी जी महिलाओं को कुशल गृहिणी ही देखना चाहते थे। 

शहर हो या गांव दो पक्षों के बीच लड़ाई-झगड़े हुए नहीं कि महिलाओं की अस्मिता को लक्ष्य करना प्रारंभ। शहर इस समस्या से निपटने में थोड़ा बीस इसलिए हैं कि कमोबेश वहां अब ये केवल कानूनी लड़ाई होती है लेकिन गांवों में कानूनी लड़ाई से ज्यादा सामाजिक लड़ाई होती है। शहर थोड़ा-बहुत आदर्शवादी हैं परंतु गाँवों में कटु यथार्थवाद ही है। 

प्रियंवदा इस बार काफी समय बाद गाँव घूमने आई है। उसने उच्च शिक्षा प्राप्त कर ली है और महिला आयोग में एक कार्यकर्ता भी है। गांव आने के दूसरे दिन बाद ही अपनी सखी रामकली से मिलने  पहुंच जाती है। पर यह क्या रामकली तो बैठी रो रही है, उसके कपड़े दो-एक जगह से फटे हुए हैं और चेहरे पर नाखून और थप्पड़ के निशान हैं।

- 'ये क्या हुआ रामकली?'

रामकली को इस तरह से किसी के आ जाने की आशा नहीं थी, वह हड़बड़ा गयी। झटके में उठी और आंसू पोंछते हुए कपड़े समेटने लगी तबतक 4-5 खून की बूंदें जमीन पर गिर पड़ीं।

प्रियंवदा को माजरा समझते हुए ज्यादा समय तो न लगा लेकिन पूरी बात जानना चाहती थी।उसने रामकली का प्राथमिक उपचार किया और पूरी कहानी जाननी चाही।

रामकली ने सुबह अपने बप्पा और हरीलाल के बीच जमीन के मसले को लेकर हुई लड़ाई के बारे में बताया। रामकली कह रही थी - 'बप्पा और उनके बीच में लड़ाई होती तो ठीक था लेकिन मेरी मरी हुई मां को गंदी-गंदी गालियाँ देने का क्या मतलब था। फिर मुझे ऐसी-ऐसी गालियाँ दी जा रही थीं कि मुझे तो घिन आने लगी थी। मजबूरी में मैंने भी झगड़े के बीच में बोल दिया, चाचा (हरीलाल) ने कहा था कि तुमको तो मैं अलग से देखूंगा। खैर 1 घंटे तक चला झगड़ा खत्म हो गया चाचा काम पर चले गए हैं ये सुनिश्चित कर बप्पा भी काम पर चले गए। लेकिन अस्ल में चाचा कहीं दूर नहीं गये थे वह दूसरे रास्ते से लौट आए। पीछे वाले रास्ते से मेरे  घर में घुसे और मेरे मुंह को दबाकर पकड़ लिया फिर कहने लगे 'बहुत बोलने का शौक न तुझे.. बहुत खून गर्म है न तेरा... और फिर.... '

यह कहकर रामकली रोने लगी।

प्रियंवदा अवाक् थी। गुस्सा और दुःख दोनों एक साथ उसके चेहरे पर देखा जा सकता था। उसने रामकली को थाने चलने को बोला। लेकिन रामकली ने मना कर दिया। रामकली ने बताया कि ऐसे ये बात दबी रह जाएगी, दो-एक दिन में ठीक हो जाऊंगी। लेकिन अगर बात बाहर गयी तो खून-खराबा तो होगा ही साथ में मेरी जिन्दगी भी बर्बाद हो जाएगी।

प्रियंवदा को रामकली पर गुस्सा आ गया और उसने नारीवाद के सारे सिद्धान्त सामने रख दिए। उसने कहा तो क्या हम ये सब ऐसे सहते रहेंगे। हमें आवाज उठानी ही पड़ेगी। दबाव में आकर और यह समझकर कि प्रियंवदा पढ़ी-लिखी है ठीक ही कह रही होगी, रामकली थाने चलने को तैयार हो गयी। प्रियंवदा अपनी स्कूटी ले आई और महिला आयोग आदि के दबाव के चलते केश दर्ज हो गया।

शाम को जब रामकली के पिता घर आए और उनको पूरी बात पता चली तो सबसे पहले तो रामकली पर ही बरसे। मामला पूरे गांव में फैल चुका था। चंदर (रामकली के बाप) ने लाठी उठाई और हरीलाल के घर की तरफ लपके लेकिन हरीलाल को पुलिस पहले ही अरेस्ट कर चुकी थी।

अब मामला कोर्ट में था। जो हरीलाल ने रामकली के साथ एक बार किया था वह वकील और समाज ने उसके साथ अप्रत्यक्ष रूप में कई बार किया लेकिन प्रियंवदा ने रामकली का पक्ष कमजोर न होने दिया।

कुछ समय बाद कोर्ट का निर्णय आया। 

हरीलाल और रामकली दोनों को जेल हुई। हरीलाल को कानूनी तौर पर! 

रामकली को  सामाजिक तौर पर-...... अकेले जीवन की जेल! चारदीवारी की जेल! ताने सुनने की जेल! 

प्रियंवदा वापस लंबे समय के लिए शहर चली गई। 


✍️ Madan Mohan Upadhyay 'Mohan'

Comments

  1. वाकई यही होता इंसाफ तक तो ठीक हैं मगर उसके बाद भी लोग लड़की को ही हेय दृष्टि से देखते हैं ।
    कोर्ट और वकील का जिक्र आने पर दामिनी फिल्म का दृश्य अनायास ही स्मरण हो आया ।

    आपने बढ़िया लिखा ।

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  2. इज्जतदार समाज की काली सच्चाई ..जहा मर्द अपनी मर्दानगी औरत की इज्जत को तार तार करके ही साबित करता है और अगर सफल न हो तो उसे चरित्रहीन साबित कर देता है!! रही बात गांधी की तो वो खुद एक अय्याश था तो उसने पुरुष प्रधान समाज की रूप रेखा तैयार की
    वरना हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता स्त्री प्रधान थी और सब कुछ उन्नत था.
    आभार ..समाज के काले चेहरे को सामने लाने के लिए
    अत्यंत खूबसूरती के साथ लिखा गया लेख ...!!

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