कहानी -: कतरा-कतरा समय



थक हारकर प्रभात और उसके तीन मित्र अब यह सोचने लगे थे कि कोई भी साधन मिल जाए भले ही लटक कर जाना पड़े । बस्ती जिले का बस स्टैंड, परीक्षा छूटने के बाद बहराइच या अयोध्या के लिए मिलने वाली बस पकड़ने के लिए शाम छः बजे वे चारों लोग पहुंच चुके थे।
खचाखच भरा हुआ बस स्टाप धीरे-धीरे खाली होता रहा सिर्फ इन लोगों को इनकी बस नहीं मिल रही थी। सूचना यह थी कि ज्यादातर बसें प्रयागराज की रुट पर हैं क्योंकि कुंभ मेला चल रहा है।
वैसे भी भारत एक धार्मिक देश है। देश की नैया जिन नेताओं के हाथ में है वो पूरी श्रद्धा से इसका ख्याल भी करते हैं। खैर वह कौन-सा अधार्मिक व्यक्ति है, बस एक छात्र-धर्म और अभ्यर्थी-धर्म के नाते बिना कम्युनिस्ट हुए ये प्रश्न तो जरूर किया जा सकता था कि जब आपकी समुचित यातायात की व्यवस्था नहीं थी तो परीक्षा को आगे बढ़ा देते। वैसे भी कौन-सी सरकारें इसपर ध्यान देती हैं.. टुकड़ो की तरह चार नौकरियां फेंक दी जाती हैं फिर मनचाही फीस वसूलते हुए परीक्षा केन्द्र के नाम पर भारत भ्रमण का मौका तक दे देते हैं। टूरिज्म भी कुछ होता है न, वर्ना क्यों एक ही समय में बहराइच का सेंटर बस्ती और बस्ती का सेंटर बहराइच आ जाए। 
खैर, 
टेंशन भी बढ़ रही थी, न जान न पहचान, वहां रुकने की भी समुचित व्यवस्था नहीं। अंततः करीब 12 बजे एक बस मिली जो अयोध्या बाइपास से निकलनी थी। बस खचाखच भरी थी, पर किया भी क्या जा सकता था, निर्णय लिया गया कि इसी में किसी तरह घुसकर चलते हैं,रात अधिक हो जाएगी अतः बाइपास से आॅटो करके फैजाबाद जाएंगे जहां से बहराइच के लिए बस मिल जाएगी। 
प्रभात सबसे बाद में घुसा अतः उसे दरवाजे के पास ही ड्राइवर की तरफ वाले हिस्से में दोनों ओर की सीट की पंक्तियों के बीच की जगह उसे खड़े होने को मिली जबकि बाकि तीनों लोग गियर बाक्स के पास बैठका बना चुके थे। बस जब अपनी स्पीड पर आई तबतक सारे लोग सेट हो चुके थे। अब कुछ ऐसा लग नहीं रहा था कि बस में तिल रखने की जगह नहीं है, जबकि थी वास्तव में नहीं। पर पता नहीं क्या जादू है भारतीय यातायात में.. रेलवे में तो खासकर कि जैसे मधुमक्खी छत्ते से चिपककर दूर तक घेरा बनाती है वैसे ही ट्रेन की गेट पर लोग ट्रेन छूटते समय होते हैं पर ट्रेन जैसे-जैसे प्लेटफार्म छोड़ती है सब पता नहीं कहां एडजस्ट हो जाते हैं। यह एडजस्टमेंट का गणित न जानने की वजह से मैंने दो-चार बार ट्रेनें छोड़ भी दी हैं। 
बहरहाल, 
तबतक प्रभात का फोन बजा तो देखा कि उस बंगाली लड़की का फोन था जो पिछले महीने ही टेलीग्राम से जुड़ी थी। प्रभात को उसकी हिंदी अच्छी लगती थी और उसे प्रभात.. परंतु यह बात निश्चित हो गयी थी कि 'ऐज ए फ्रैंड... '। फोन रिसीव करते ही उधर से बंगाली लड़की ने एक ही सांस में बीसों सवाल दाग डाले... जो कि उसका उसके प्रति प्रेम था, प्रभात को भी अच्छा लग रहा था और वह मुस्कुराए जा रहा था, उसने कुछ बातें की फिर मुस्कराते हुए फोन काटा तो गौर किया कि उसपर कोई बड़ी देर से गौर कर रहा है। 
गौर करने वाली एक लड़की थी जो कि इस कहानी का मुख्य केंद्र है। 
लड़की के बगल विंडो साइड बैठे उसके पापा और प्रभात के पीछे थ्री सीटर पर बैठे उसके भाइयों को देखकर और उनकी आपसी वार्तालाप को सुनकर ही पता चला कि वो नेपाली है। वह चेहरे की बनावट से टिपिकल नेपाली नहीं थी। अच्छी-खासी नाक नक्श और गोरा रंग, यूं कहिए कि खूबसूरत कहे जाने के जितने गुण उसमें हो सकते थे वो सब थे। लड़की वो खास थी। 
प्रभात ने अपनी पोजीशन चेक की कि कोई दिक्कत तो नहीं है जिससे वह घूर रही हो पर ऐसा कुछ नहीं था। प्रभात ने सोंचा ऐसे ही होगा और फोन पर उंगलियां फिराने में व्यस्त हो गया। कनखियों से यह आभास हो रहा था कि वह अब भी देख रही है। सुबह का चार्ज किया फोन आफ हो चुका था, प्रभात ने फोन को जेब में डाला और थ्री सीटर पर पीठ टिकाकर हल्का घुटना मोड़ा और आगे की सीट जिसपर वो बैठी थी उसे पकड़ कर खड़ा हो गया। भावनाएं अब प्रभात की भी उफान मारना शुरू कर चुकी थीं। फिर भी उसने कोई हरकत न की न ही उल्टे उसको घूरा। थोड़ी देर बाद प्रभात ने उसका सिर अपने हाथ पर महसूस किया, ये सुनिश्चित करने के लिए कि वह प्रायोजित है या एक्सिडेंटल उसने अपना हाथ जरा सा आगे खींच लिया लड़की ने दुबारा उसके हाथ पर ही सिर रखा बल्कि इस बार थोड़ा सा दबा दिया। 
कंडक्टर ने अगला स्टाप अयोध्या बाईपास होने की सूचना दी, बेचैनी दोनों के चेहरों पर देखी जा सकती थी क्योंकि टिकट लेते वक्त दोनों को पता हो गया था कि बाईपास पर साथ छूट जाना है। चूंकि उसका परिवार भी साथ था ऊपर से पहली बार में डर बना ही रहता है कि कहीं सामने से उल्टी प्रतिक्रिया न आ जाए।
प्रभात ने स्पष्ट सुना कि वो अपने भाई से बैग में रखी डायरी और पेन ये बता कर मांग रही थी कि उसे कुछ इंट्री करनी है। परंतु उसके भाई ने बाद में कर लेने को बोल कर मना कर दिया और वो इन्सिस्ट भी न कर पाई। स्टाप बिल्कुल करीब आ चुका था, उसका पूरा परिवार भी अब अर्द्ध निद्रा वाली स्थिति से निकल कर सक्रिय हो चुका था। प्रभात अपने को गुनाहों का देवता महसूस कर रहा था, उसे कुछ सूझा और अपने जेब में कागज के नाम पर पड़े टिकट को निकाला और सबकी नजरें बचाते हुए फोन नंबर लिखा, तब तक स्टाप आ चुका था, लड़की के पापा उस लड़की से लगातार बात कर रहे थे। प्रभात ने पर्ची वहीं गिराने को सोंचा तो ऐसा लगा जैसे पूरी बस उसे ही देख रही हो। तबतक नीचे उतरने के लिए लोग एक-दूसरे को धकेल कर आगे बढ़ने लगे प्रभात भी धक्के में नीचे उतर आया।प्रभात ने आगे बढ़कर विंडो से देखने की कोशिश की तो लड़की की दोनों आंखों में आंसू थे.. अबतक प्रभात की भी आंखें नम हो चुकी थी। 
हाथ में पर्ची पकड़े वह मन ही मन भगवान से पूंछ रहा था कि उसकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा काटकर इधर थोड़ा सा समय बढ़ा नहीं सकते थे क्या? 
और बस.. बस भी ओझल हो गई धीरे-धीरे.. । 

✍️ मोहन

Comments

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  2. अद्भुत प्रस्तुतिकरण!
    🙏🏻 🙏🏻

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  3. मो ह न भाई..!

    सबसे पहले एक अच्छी कहानी लिखने हेतु बधाई स्वीकारें..दूसरी बात यह कहनी है कि कहानी में प्रभात जब बस में बैठता है और बस प्लेटफार्म छोड़ती है तो लेखक स्वयं की भी पीड़ा व्यक्त करता है
    " यह एडजस्टमेंट का गणित न जानने की वजह से मैने दो चार बार ट्रेन भी छोड़ दी है "
    चेखव को पढ़ा था कभी..उन्होंने कहा था कि
    " बिना जीवन दर्शन के कोई अच्छी चीज नही लिखी जा सकती..हर लेखक का अपना जीवन दर्शन उसके अपने अनुभवों के निचोड़ से निकलता है..अगर लेखक जीवन से जुड़ा नही है तो वह केवल दर्शन या राजनीति की किताबें पढ़कर कहानी नही लिख सकता "
    इस तथ्य से इन्कार नही किया जा सकता कि कहानी में जिस तरह समाज और जीवन को देखने की कोशिश की गयी है कि वह प्रभावशाली बन पड़ा है..एक तरफ प्रभात जहाँ बंगालन लड़की की बातों से मन ही मन रसगुल्ला काट रहा है "जो कि उसका उसके प्रति प्रेम था, प्रभात को भी अच्छा लग रहा था और वह मुस्कराये जा रहा था "
    ठीक तभी दूसरी नैपाली लड़की के लिये भी उसकी आंखों में आंसू आ गये..फिलहाल यह कहानी का कमजोर पक्ष भी है क्योंकि ऐसा होता नही कि मात्र कुछ पल की संवादहीन मुलाकात में प्रेम रोने रुलाने तक पहुँच जाये ऐसे में दिव्या का व्यंग्य उचित ही लगा कि "मुझे भी रोना आ गया क्योंकि मैं प्रभात को जानती भी हूँ"
    अन्त में यह अवश्य कहूंगा कि कहानी पाठक को बांधने में सफल है..प्रवाह व सम्प्रेषण की दृष्टि से कहानी पूरी लय में चली है..पुनः बधाई

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    1. सर आप खुद इतने बेहतरीन लेखक व समीक्षक हैं इसलिए आपकी टिप्पणी महत्वपूर्ण है |अगर ये आपको पसंद आई फिर वास्तव में अच्छी है |आभार आपका

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    1. बहुत बहुत आभार भैया ❤️

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  5. एक बेहतरीन कहानी..... पाठक को जोड़े रहने में सफल कहानी.....

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  6. सर....!!!
    बेहतरीन कहानी .... बधाई 🌺
    आपकी लिखी कई कहानी पढ़ी लेकिन ये सबसे अलग लगी
    मानो ऐसा लग रहा है जैसे कोई लाइव स्टोरी हो
    थोड़ा मन उदास भी हुआ और हंसी भी आई इतनी जल्दी किसी की तरफ आकर्षित होना... यहाँ तक कि आँख में आसू भी आ जाना थोडा अजीब लगा
    पर अच्छा है... ☺☺
    ऐसे ही आप लिखते रहें.... मुझे तो आपकी लिखी NOVEL पढ़नी है

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  7. भाई इस कहानी से अपनी उम्र का हर लौंडा रिलेट कर पायेगा,
    और यही इस कहानी का सच्चा पारितोषिक होगा ।
    कहानी का कथानक आपने बढिया चुना है , भूमिका की शैली भी आकर्षित करने वाली है कुलमिलाकर आप भी चल पड़े हैं गद्य की ओर धूमधाम से शुभकामनाएं 👍

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  8. सारगर्भित लेख

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  9. सारगर्भित लेख

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  10. Bhahut hi bhadiya sir 😀😀👍👍👍

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  11. क्या सर जी मैं तो खो गया था लग रहा था वही बैठ के लाइव देख रहा हूं सब कुछ अद्भुत सर जी अंतिम पल में आंखों में आसूं आना दिल सहम सा गया लगा की सामने ही है सब कुछ ऐसे ही कुछ और कहानियों का इंतजार सर 🙏🙏

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  12. वाह सर , बहुत खूबसूरत 👌👌👍👍

    एक मार्मिक और सजीव चित्रण 💐💐

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