समीक्षा (The Review)

डॉ दिनेश त्रिपाठी 'शम्स' जी का ग़ज़ल संग्रह 'आंखों में आब रहने दे' की समीक्षा (Ankhon Main aab rahne de)

आँखों में आब रहने दे 

तुझको दुनिया समझ न ले पत्थर
कुछ तो आंखों में आब रहने दे। 

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पुस्तक~ आंखों में आब रहने दे
गजलकार ~ डॉ दिनेश त्रिपाठी 'शम्स' 
विधा ~ ग़ज़ल
प्रकाशन~ मीनाक्षी प्रकाशन 
मूल्य ~ 100/-



समीक्षा  

         ✍️ मदन मोहन उपाध्याय 'मोहन' 


समकालीन ग़ज़ल के सशक्त हस्ताक्षर डॉ दिनेश त्रिपाठी 'शम्स' किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हिंदी शायरी में नए प्रयोगों, छोटी-बड़ी सभी बह्रों और बड़ी रदीफ़ पर लेखन में भी आप सिद्धहस्त हैं। ग़ज़ल के व्याकरण की दुनिया में आप शीर्ष स्थान पर हैं।
 यूं तो पुस्तक की शुरुआत में आपने विज्ञप्ति दिया है कि इसमें समाहित सभी ग़ज़लें आपकी रचना धर्मिता के आरम्भिक उन्मेष के समय की हैं तथापि उसमें कोई कच्चापन नहीं है। 
68 गजलों वाले इस संग्रह की पहली ही गजल का पहला पहला ही शेर एक नायाब उपदेशक के तौर पर आंगन को ही टेढ़ा बताने वालों को आइना दिखाता है -
    
       सिर्फ़ बाहर न तीरगी देखो,
      अपने भीतर है कुछ कमी देखो।

जब आप भवसागर की उठापटक में असंख्य गोते लगा चुके होते हैं तो तमाम अनुभवों के समत्व के रुप में स्थितिप्रज्ञता की एक स्थिति आती है -

          सारी दुनिया ही इक तमाशा है,
          और हम सब हैं नट-नटी देखो।


असमानता और राजनैतिक अव्यवस्था को दिखाते अल्फाज़ भी हैं-

     सिर्फ़ नारों में व्यवस्था है बिचारी देखिए, 
    आसमां से है जमीं की जंग जारी देखिए। 

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      जन वंचित के वंचित ही रह जाते हैं, 
     और तंत्र को मिली सभी सुविधाएं होती हैं 


अस्थिरता और राजनैतिक जुमलेबाजी चहुंओर व्याप्त है। एक अघोषित अराजकता का माहौल है। पार्टियों के अनुरक्त भले ही व्यक्तिगत लाभ में अंधे हों पर बहुसंख्यक लोगों में असंतोष है। कदाचित् गजलकार ने ऐसे लोगों में क्रांति का जोश भी भरा है - 
   
   ये व्यवस्था यूं न बदलेगी सुनो, 
   बढ़के इसको बदल डालो यार अब। 

'शम्स' जी ने अन्यत्र भी लिखा है कि - 
   

       हम नहीं डरते तिमिर के जोर से 
      अंततः हम जा मिलेंगे भोर से
       वो हमें कब तक करेंगे अनसुना 
      आइए हम और चीखें जोर से।। 


छोटी बह्र पर भी बड़ी रदीफ़ की गजलें आपकी शिल्प की परिपक्वता है - 
     

   हर थकन से दूर रहती है 
   प्यार के अहसास की यात्रा। 
   उस नगर में हर कोई पहुँचा 
    रुक गई जब सांस की यात्रा। 
   दर्द में कटना बहुत मुश्किल, 
    यार यह संत्रास की यात्रा। 

समाज सुधार और दबे-कुचलों की भी आवाज है - 

   हाथ जो चाय के ग्लास हैं धुल रहे, 
   उनको भी दीजिए अब कलम - कापियाँ। 


निरंतर आशावाद और सिक्के के दोनों पहलुओं को उजागर करते हुए सजग रचना धर्मी के रुप में आपकी उपस्थिति है -


    दर्द में गर मज़ा नहीं होता, 
     प्यार दिल में जगा नहीं होता।
   हौसले रास्ता दिखाते हैं
   जब कोई सगा नहीं होता। 


अंत में निचोड़ जैसा कुछ निर्गत है कि - 

  हँसते और हँसाते रहना, 
  सबका दर्द चुराते रहना 
   मन कुछ हल्का हो जाता है, 
    यूं ही आते-जाते रहना। 
   'कल' से कुछ उम्मीद न करना, 
     पहले आज सजाते रहना। 


और इस तरह गजलकार ने जीवन और समाज के तमाम आरोहों-अवरोहों को शब्दों में पिरोते हुए हम पाठकों के लिए - 'ग़ज़लों की इक किताब तुझे दे रहा हूं मैं' 

शिव ओम अम्बर जी के शब्दों में
  ' दिनेश त्रिपाठी शम्स की गजलों की भाषा एक आम हिन्दुस्तानी की रोजमर्रा की वार्ता-भाषा है। उसमें ''मुन्सिफ़-तिजारत - हुनर-रोशनी-दामन'' भी हैं और ''असीमित - आतुर - निष्ठा-समिधा-यज्ञ'' भी। '' 

अब  सर यह भी बोल सकते हैं कि आलोचना वाला पुट कहां है इसमें तो मैं पहले ही स्पष्ट कर दूं कि मुझमें इतनी बौद्धिक प्रगाढ़ता अभी नहीं है कि आपमें कमी निकाल दूं तथापि अगर किसी को यह लगे कि इसके बिना समीक्षा अधूरी है तो मैं प्रूफ रीडिंग का दोष बता सकता हूं जहां 'गांधीवाद' का 'गांधीवादी' लिखा है। 

व्यर्थ की बातें हुई सद्भाव, समता, प्रेम की,
आज गांधीवाद के बस अर्थ खद्दर हो गए।


✍️ डॉ दिनेश त्रिपाठी 'शम्स' (गजल संग्रह - 'आंखों में आब रहने दे' )

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