विधान को मानना ही देवत्व है।



जब लोग 'मर्यादा पुरुषोत्तम राम' कहते हैं तो बहुत लोग ये समझते हैं कि भगवान् विष्णु ने केवल अवतारी के रूप में ही सांसारिक मर्यादा (कर्मफल) का पालन किया;वो भी राम के रूप में। श्रीकृष्ण के प्रति ये धारणा है कि वे कर्मबंधन से नहीं बंधे थे, या वे श्रीराम की तरह मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं थे।
  परंतु अगर ध्यान से देखा जाए तो कार्य-कारण से परम ब्रह्म के तीनों शक्तिपुंज ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी अपने वास्तविक स्वरूप में बंधे हुए हैं, वे अपनी मर्यादा नहीं लांघते।
 'इंद्र' एक सिंहासन का नाम रहा है। उसपर बैठने वाले देवराज बदलते रहे हैं। अर्जित सुकर्मों के अनुसार कोई भी आत्मन् देवता, मनुष्य या अन्य योनि में होता है।

भगवान शिव और माता सती ने कभी कर्मबंधन को मानने से इंकार नहीं किया।
श्रीकृष्ण ने महाभारत में अर्जुन को अपने विराट स्वरूप का दर्शन तो कराया परंतु कौरवों की हत्या के निमित्त बनने की वजह से गांधारी के श्राप को उन्होंने कभी नहीं काटा, पूरा यदुवंश उनकी आंखों के आगे लड़कर मर गया, स्वयं भी एक बहेलिए की तीर से मरे।
रामायण की कथा का आदि भगवान विष्णु के कर्मफल को भोगना ही है। वृंदा के शाप के बाद जब लक्ष्मी जी ने सीता के रूप में अपने विछोह को काटने में दुःख व्यक्त किया और कहा 'आप इसे अस्वीकार क्यों नहीं कर देते।'
भगवान विष्णु ने कहा 'विधान को मानना ही देवत्व है।'

✍️ मोहन

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