हास्य-व्यंग्य कहानी : दादा की आफ्टर मैरिज गर्लफ्रेंड

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     हास्य-व्यंग्य कहानी

      ✍️ मोहन 


 '' दादा कुछ अजीब नहीं हो.. इक्कीसवीं सदी में काॅलेज तक की पढ़ाई कर ली, लाॅ की डिग्री ले ली और एक भी गर्लफ्रेंड न बनाई।'' 

दादा को लड़कों ने चिढ़ा दिया और चढ़ा भी दिया। 

बात लड़के सही कह रहे थे, दादा शादीशुदा हो गए थे बीबी भी खूबसूरत पायी पर गर्लफ्रेंड का मजा न पाए। 

फलाने दादा अभी तक लड़कों को नककटा समझते थे लेकिन लड़के चूंकि अपने को नककटा नहीं समझते थे और अपने ग्रुप में दादा को शामिल करना चाहते थे। सो लड़के हमेशा दादा के सामने गर्लफ्रेंड की अच्छाई के कसीदे पढ़ते। 

  दादा भी ठहरे इंसान... एक दिन मन बदल ही गया। सोंचा बीबी घर पर ही तो रहती है वैसे भी कोर्ट में मुवक्किल न आए तो सिंगलैती रहती है लाओ गर्लफ्रेंड बना ही लेते हैं। 

  साथी बनाने के लिए व्यक्ति अपना कार्यक्षेत्र चुनता है... क्योंकि बहुत सारी सहूलियतें रहती हैं। 

दादा ने भी यही किया था... 

 दैवयोग से चैम्बर में चार चौकी छोड़कर पांचवी चौकी की एडवोकेट दादा को देखने में ऐसी गर्ल लगी जिसको फ्रैंड बनाया जा सकता था। 

पढ़े लिखे दादा को यह पता था कि पुरुष अपने को कितना भी तैयार कर ले स्त्री की नजर में अच्छा लगने के लिए अगर एक स्त्री का भी हाथ लग जाए तो बात कुछ और ही बन जाती है। भाभी सुबेरे दादा को तैयार करने में मदद करें इसलिए दादा शाम को भाभी का पैर भी दबाते। 

   इधर लव स्टोरी की किताब - सिताब पढ़ना, शैलेन्द्र 'शैल' जी के शेर पढ़ना और कुछ मूवीज देख कर अपने को रोमांटिक बनाने की भी प्रक्रिया चला रहे थे। 

  दादा जब एक दिन जब दोपहर में चैम्बर में खलिहर बैठे थे तो केवल पांचवी चौकी वाली शख्स ही जग रही थी बाकी चार चौकियों के वकील स्वाति नक्षत्र का पानी पीने को आतुर पपीहे की तरह ऊपर की ओर मुंह खोले सो रहे थे... पानी तो नहीं, हां मक्खियां जरूर कुछ...। खैर दादा ने मौका ताड़ा और पांचवी चौकी की ओर आंख मारी... पर संयोग देखिए.. पांचवी चौकी वाली ने उसी वक्त इनके विपरीत दृष्टि घुमाई और चौथी चौकी वाले वकील साहब ने जगते हुए इनकी तरफ। उन वकील साहब ने हल्की सी मुस्कान बिखेरी और हल्की सी आंख इधर भी मार दी। दादा कुछ सोंच समझ पाते कि वह उठकर इनकी कुर्सी तक आ गए और कहने लगे.... 

  'चाहता मैं भी आपको बहुत दिनों से हूं पर कह नहीं पा रहा था, आप बहुत मासूम और क्यूट दिखते हो। आपके भोलेपन पर मैं अपना जहां वार दूं... ' 

दादा सकपका गए। उनकी स्थिति सांप छछूंदर वाली अब यह भी न कह सकते थे कि मैंने आंख फलानी को मारी। तबतक उन वकील साहब ने दादा की पीठ को हल्के हाथों से सहलाया और कहा' 'बहस का टाइम हो गया है अभी चलते हैं, आप तो जानते ही हैं मेरी बीबी को गुजरे 3 साल हो गए हैं.. आज डिनर पर चलते हैं। '' 

 चूंकि वे जा रहे थे तो उनके जाने की खुशी में सारी बातें दादा सुन लिए। फिर मत्थे पर उभर आए पसीने को पोंछते हुए और पीठ पर सहलन का एहसास मिटाते हुए सोंचे कि उससे मिल कर बात करता हूं। 


दादा उसकी चौकी तक पहुंचे.. नरभसा पहले ही गए थे। खैर जिस अंदाज में उससे पूंछा 'सुनिए आप का नाम क्या है? ' तेज तर्रार वकील होने के नाते वह इरादे भांप गई। उसने दादा के साथ खेल करना चाहा और मुस्कराते हुए बोला '' जी, मेरा नाम 'दीदी' है। '' 

-'दीदी 🤔 🤔' दादा सकपकाए ये कैसा नाम है। 

पर वकील बुद्धि और तर्कशील प्राणी... दादा ने अपने दिमाग को समझा लिया कि क्यों एक लड़की का नाम दीदी नहीं हो सकता। 

आज रात दादा ने भाभी का पैर न दबाया.. कारण कि थके थे.. एक तो वकील साहब के आतंक का ख्याल दूसरे 'दीदी' के बारे में. 'ख्याली पुलाव'। 

दादा ने टांग फैलाया और सो गए। सोते हुए बुदबुदाना शुरू किए... 'कल उसके लिए चाकलेट ले जाऊंगा। उससे चैम्बर में नहीं बाररूम के सबसे साफ वाले कोने में मिलूंगा, अगर उसने मना न किया तो बाएं गाल पर एक चुम्मी लूंगा '। यह सब कहते हुए बगल में बैठी भाभी को सहला भी रहे थे। 

भाभी के जब बर्दाश्त से बाहर हो गया तो गईं बेलन उठा लाईं और झिटक कर दादा को जगाईं..। 

दादा हड़बड़ाकर उठ बैठे और चिल्लाए -'अगर चौथी चौकी का वकील हमारे बीच आया तो उसकी टांग तोड़ दूंगा। '' 

मगर तब तक माहौल समझ चुके दादा सहम गए। 

'कौन है वो कलमुंही? ' 

दादा थे तो वकील पर भाभी के सामने झूठ न बोलते थे। 

बता दिए - 'दीदी। ' 

-'हैंऽऽ.... दीदी? उसका तुम चुम्मा लोगे? मुझे बना रहे हो? बताओ सच-सच कौन है? ' 

- 'मैं सच कह रहा हूँ दीदी ही है। ' 

-'अच्छा, दीदी हैं फिर तो फोटो दिखाओ' 

दादा ने वही फोटो दिखाई जो एक बार फेसबुक पर पोस्ट भी की थी। 

-'ये कब बनी दीदीं? ' 

-'बनीं क्या.. बचपन से हैं.. परिचय कल हुआ। ' 

-'नहीं - नहीं.. कुछ झोल है। एक काम करो.. इनको फोन करो और दीदी बोल कर दिखाओ। '

मरता क्या न करता दादा ने फोन कर कहा' 'हैल्लो दीदी जी कैसी हो? जवाब आया.. 'मैं अच्छी हूं आप को याद कर रही थी '..... भाभी इधर बेलन फेंककर दादा के लिए मलाई वाला दूध लाने के लिए निकल चुकीं थीं। 


✍️एम. मोहन



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