कहना

कुछ लोग कहते हैं 'लोग क्या कहेंगे!' और कुछ लोग कहते हैं 'लोगों का काम है कहना'। अगर यहां देखा जाए तो पहले वाले में भौतिकता के रास्ते और दूसरे में आध्यात्मिकता के रास्ते पाए जा सकते हैं।
जब हम कहते हैं 'लोग क्या कहेंगे!'  तब हम अपने को समाज की एक कड़ी के रूप देख रहे होते हैं। समाज से जुड़े रहकर उसको अपनी क्षमतानुसार अपने अनुकूल बनाकर और उसकी क्षमतानुसार उसके अनुकूल बनकर भौतिक उन्नति करते हैं। सांसारिक लाभ-हानियों को देखते हैं। ए ग्रेड की जॉब ही अंतिम लक्ष्य होती है... आईएएस ही बनना होता है। फिर ये 'कुछ लोगों का कहना' हमको उसी दिशा में धकेलता भी रहता है.... मोटिवेशन देता है।
अगर दूसरे वाले को देखें तो शिक्षा के पांच चरण में जो एक चरण अन्नमय कोष का है उसके लिए पेट भरने के लिए कोई भी एक छोटी सी नौकरी लेकर फिर अपनी शक्तियों को आध्यात्म की जानकारी में लगा देते हैं। हमें पता होता है कि सांसारिक उन्नति का कोई अंत नहीं है, और न ही कोई ऐसा स्टेज है जहां आलोचना न हो। हम सोचते हैं आईएएस बनकर ये करेंगे वो करेंगे, जबकि यहां प्रधानमंत्री तक पर मेम्स बनते हैं। इसलिए सासांरिक दुनिया में गुजारा करने भर का हो जाए तो वास्तविक ज्ञान की तरफ उन्मुख हो जाना श्रेयस्कर है।
वरना वर्तमान समाज ने 'पेट की शिक्षा' को ही मानव शिक्षा का लक्ष्य बना दिया है। हम जीवन भर वही सीखते रहते हैं, उसी के लिए प्रतियोगिता करते रहते हैं।

✍️ मोहन

Comments

  1. मुझे तो लगता है कि लोग क्या कहेंगे हम को बाँध कर रखता है और 'लोगों का काम कहना' हम मान ले और उसकी उतनी परवाह न करे तो यह हमें स्वतंत्र करता है। हाँ, फिर इस स्वतंत्रता का प्रयोग व्यक्ति कैसे करता है वही उसका असली चरित्र दर्शाती है। कई लोग इसका अच्छा प्रयोग करते हैं और कई ऐसे भी है जो इसका दुरुपयोग कर बदनाम हो जाते हैं। रोचक आलेख है।

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