ट्यूशन
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बस छोटी सी बात कहनी है, कोई लंबा लेख नहीं है।लेख गार्जियन्स के लिए है जो अपने बच्चों को ट्यूशन पढ़वाते हैं। मेरा ट्यूशन पढ़ाने का लंबा अनुभव रहा है। कल एक ट्यूशन पढ़ाने वाले मित्र की मनःस्थिति और कुछ उलझनों को देखकर लगा कि मुझे गार्जियन्स से उन अनुभवों को शेयर करना चाहिए। यह कुछ हद तक स्कूल और कोचिंग के परिप्रेक्ष्य में भी उपयोगी हो सकता है तथापि ट्यूशन के लिए अधिक उपयोगी है।
बहुधा गार्जियन्स को देखा जाता है कि जब वे टीचर से पढ़ाए जाने वाले समय, फीस, 'क्या पढ़ाया' आदि पर बात कर रहे होते हैं तो उनका बच्चा वहीं होता है। जब वे ट्यूशन टीचर को फीस दे रहे होते हैं तो बच्चा वहीं होता है। जब वे टीचर से गैरहाजिरी के दिनों पर बात कर रहे होते हैं तो बच्चा वहीं होता है।
'टीचर ने क्या पढ़ाया/कितना पढ़ाया/ कैसे पढ़ाया?' ये प्रश्न 'डायरेक्ट' बच्चे से पूछते हैं।
क्या आपको नहीं लगता कि जो व्यवसाय का रिश्ता केवल आपमें और टीचर में होना चाहिए उसमें नाहक बच्चे को घसीट रहे हैं!
क्या बच्चा टीचर के प्रति श्रद्धालु रह पाएगा इसके बाद?
'श्रद्धावान्लभते ज्ञानम्'
किसी से कुछ सीखने के लिए उसमें श्रद्धा होनी चाहिए। इसकी अनुभूति आप खुद कर सकते हैं, अगर आप को किसी पुस्तक/लेखक/प्रकाशक में श्रद्धा नहीं है तो आपको उस पुस्तक से कुछ नहीं मिलेगा, आप उसे रुचि पूर्वक नहीं पढ़ पाएंगे। अगर आपको डाक्टर में श्रद्धा नहीं है तो आप उसके इलाज से निरोगी हो चुके!
अब उपरोक्त बाद का यह मतलब नहीं निकला कि आप टीचर का मूल्यांकन न करें, आप बिना टीचर का संदर्भ लिए बच्चे का मूल्यांकन कीजिए ; टीचर का मूल्यांकन अपने आप हो जाएगा। कम से कम बच्चे के सामने टीचर को जितनी इज्जत हो सके दीजिए। जब आप टीचर को हटा रहे हों तो बच्चे की नजर में ये नहीं आना चाहिए कि उसको पढ़ाने के तरीके/फीस यानी नकारात्मक कारणों से हटाया गया है।
✍️ मोहन
Real story😍😍😍
ReplyDelete💐💐
DeleteReal one🙏
ReplyDelete💐💐
Delete❤️❤️
ReplyDelete💞Right sir
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